A Non-Profit Non-Commercial Public Service Initiative by Alka Vibhas   
प्रणतनाथ रक्षि कान्त

प्रणतनाथ ! रक्षि कान्त । करि तदीय असुख शांत ॥

अशुभा ज्या योजिं दैव । पतिंलागीं, त्या सदैव ।
परिणमवी मंगलांत ॥